जब इस्क इनों आवसी, तब देखेंगे मुझको ।
इस्क बिना इन अर्स में, मैं मिलों नहीं इनसों ।।
ए जो मासूक जबरूत का, कहियत है लाहूत । सो...

Question: ए जो मासूक जबरूत का, कहियत है लाहूत । सो इत हुआ जाहिर, ऊपर मसनन्द मलकूत ॥ कृपया श्री बीतक साहिब प्र 62 चौ 59 का बेवरा करें सुन्दरसाथ जी
Answer: अक्षर ब्रह्म के प्रीतम परमधाम में रहने वाले अक्षरातीत श्री राजजी महाराज हैं। यानि श्री राजी महाराज अक्षर ब्रहम के भी महबूब हैं जैसे रूहों के हैं अक्षर ब्रह्म भी परमधाम में श्री राज जी महाराज का आशिक है और इस खेल में उतर आने से श्री राज जी महाराज अब उनके आशिक हैं इसलिए मोमिनों ब्रह्म सृष्टि के यहां आ जाने से सारी दुनियां को भी अक्षरातीत की पहचान इस मिट जाने वाले संसार में हो गई है