दुल्हे ने दिल हाल दे, खैंच लिए दिल सारे ।
कहा कहूं सुख इन विध, जो किए हाल हमारे॥
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धाम धनी जी ने खेल दिखाने के लिए अपना हुक्म का स्वरूप बनाया और 12000 रूहों के भी हुक्म के स्वरूप बनाये । अब चौ . मंथन करें ,धाम धनी की आज्ञा (आदेश) ने हुक्म स्वरूपा आत्माओं को माया का यह खेल दिखाया है। धाम धनी के हुक्म से ही आत्माओं ने इस हुक्म (आदेश) स्वरूप ब्रह्माण्ड को देखा है। संसार के सभी प्राणियों को न्याय (आखिरत) के दिन हुक्म से ही बहिश्तों का सुख प्राप्त होगा और दोजक में प्रायश्चित की अग्न...
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परिकरमा ग्रन्थ से प्रेम को अंग बरनन वाले प्रकरण की चौथी चौपाई
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रसूल साहब कहते हैं कि पारब्रह्म अतीत में छिपे हैं जो दिखाई नहीं देते। हमारा खुदा मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारों में बैठा है। उसकी हम पूजा करते हैं। हम छिपे परमात्मा को जो नजर नहीं आता, नहीं मानते। हम तो परमात्मा को सामने देखकर पूजते हैं (हम प्रत्यक्ष की पूजा करते हैं, परोक्ष की नहीं)।
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महामत कहे ए मोमिनों,ए निसबत इस्क सागर। ल्यो प्याले हक हुकमें, पिओ फूल भर भर ।।
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यहाँ श्री महामति जी के हृदय में विराजमान श्यामा जी की आत्मा कहती है कि मैं परब्रह्म अक्षरातीत की अंग रूपा हूं तथा सभी ब्रह्ममुनि मेरे ही अंग हैं। सभी माया का खेल देखने इस संसार में आए हैं। अब मैं तारतम ज्ञान के प्रकाश में सबको परब्रह्म की पहचान कराकर एकत्रित करूंगी।
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