जब याद तुमें मैं आंऊगा, तबहीं बैठोगे जाग ।
गए आए कहूं नहीं, सब रूहें बैठीं अंग लाग ।।
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हक की मेहर सिर्फ निसवती सुन्दरसाथ ब्रह्मसृष्टि के लिए ही आई है हक मेहर तित होत है जित असल है निसवत श्री राजी महाराज जी की मेहर तो ब्रह्म सृष्टियों के लिए,कृपा ईश्वरी सृष्टि के लिए,दया जीव सृष्टि के लिए आई है।
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तीसरी भोम की पड़साल में सुबह जब पशु पक्षी अमीरस पीते हैं तो शीश कमल पर पाग शोभा देती है और जब शाम को श्री राजस्यामा जी वनों में सखियों संग भ्रमण पर जाते है तब सारे पशु पक्षी भी साथ ही होते हैं और शीश कमल पर मुकुट की शोभा आती है
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छठा ईलम का सागर ही हुकम का सागर है जो मेहर के सरूप श्री राजजी महाराज के अधीन है
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श्री खिमाई भाई जी
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