आज की चौपाई

तुम बैठे मेरे कदम तले, कहूं गईयां नाहीं दूर।
ऐ याद करो इन इस्क को, जो आपन करीं मजकूर।

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Shri Nijanand Samparday

तुम निरखो सत सरुप, सत स्यामाजी रूप अनूप। साजो री सत सिनगार, विलसो संग सत भरतार।।{कि.76/3} बेवरा करें सुन्दरसाथ जी

by Shri Nijanand Samparday

हे रूहो! तुम अपने अखण्ड तनों को देखो। अपनी परआत्म को निरखो। अपनी सुभान श्री श्यामाजी का अनुपम स्वरूप देखो तथा अपने अखण्ड धनी से विलसने के लिए अपने अखण्ड सिनगार को धारण करो (अर्थात् संसार में सच्चे अंग के भाव से चलो)।

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रंगमहल की बाहरी रौंस की पूरी गृद में साथ लगती हुई कौन कौन सी जगह की शोभा आई है बताईए सुन्दरसाथ जी

by Shri Nijanand Samparday

रंगमहल की बाहरी रोंस की पूरी गृद में पूर्व की तरफ चांदनी चौंक के साथ अनार,अमृत और जांबू वन की शोभा आई है दक्षिण में बट पीपल की चौंकी, पश्चिम में फूल बाग उत्तर में लाल चबूतरा खड़ोकली और ताड़वन की शोभा आई है सुन्दरसाथ जी

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इस जागनी ब्रहमांड की लीला में असराफील के जिम्में क्या काम है बताईए सुन्दरसाथ जी

by Shri Nijanand Samparday

असराफील ने दो सूर फूंकने है एक तो हरिद्वार में सारे धर्माचार्यों में श्रीजी साहिब जी जाहिर हुए और सब धर्माचार्यों का गुमान तोड़ा और फिर दूसरा सब काजियों का गुमान तोड़कर ईमाम मेंहदी जाहिर हुए यह पहला सूर असराफील ने फूंका दूसरा सूर फूंकने के लिए वोह तैयार खडा है जो विष्णु को जाकर तारतम देगा फिर ब्रह्मांड प्रलय होगा यह दो काम असराफील के जिम्में हैं

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धनी श्री देवचन्द्र जी ने श्री मिहिराज जी को किन दो रूहों के बारे में कहा था कि जब यह दोनों जाग्रत हो जाएंगी तो तब घर चलने की तैयारी होगी

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श्री साकुमार और श्री साकुंडल

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ए जो मासूक जबरूत का, कहियत है लाहूत । सो इत हुआ जाहिर, ऊपर मसनन्द मलकूत ।। श्री बीतक साहिब मंगलाचरन की यह चौ. क्या कहती है बताईए सुन्दरसाथ जी

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अक्षर ब्रह्म के प्रीतम परमधाम में रहने वाले अक्षरातीत श्री राजजी महाराज हैं। यानि कि परम धाम में जैसे रूहें अपने धनी की आशिक हैं वैसे ही अक्षर ब्रहम भी श्री राज जी महाराज का आशिक है और इस खेल में उतरने से रूहों और अक्षर ब्रह्म दोनों को श्री मुख वाणी से पता चलता है कि रूहें और अक्षर ब्रह्म दोनों तो धनी के माशूक हैं और धाम धनी ही केवल सारे परम धाम के आशिक हैं । मोमिनों (ब्रह्मसृष्टियों) के यहां आ जा...

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