दुल्हे ने दिल हाल दे, खैंच लिए दिल सारे ।
कहा कहूं सुख इन विध, जो किए हाल हमारे॥
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श्री कुलजम सरूप साहिब के रास ग्रन्थ को जाग्रत बुद्ध की भागवत कहा है जिसका वर्णन श्री निजानंद पद्धति में आता है व्यास वाली भागवत तो स्वपन की बुद्धि की है
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ठट्ठे नगर में जब चिंतामनि और उसके शिष्यों को तारतम दिया था तब श्री जी ने परहेज बताया था
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अब सारी दुनियां के लोग इस बात को समझेंगे, क्योंकि शरीयत का झण्डा रसूल साहब की कुरान, मारफत का झण्डा श्री कुलजम सरूप साहब की वाणी पुकार कर रही है। यही बातूनी ज्ञान का झण्डा यह वाणी ही है जो अक्षर के पार परमधाम तक पहुंचाती है।
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श्री राज जी महाराज की तीन सूरतें हैं जिसे कुरान में अलफ लाम मीम और श्री कुलजम वाणी में बसरी मलकी हकी सूरत कहा है इन तीनों सूरतों को मिलाने पर सत चित् आनद मिल कर एक सच्चिदानंद पारब्रहम सरूप हैं पहली चौपाई में मलकी महमंद श्री श्यामा जी हैं और दूसरी चौपाई में बसरी महमंद अक्षर की आत्म को कहा है
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हे रूहो! तुम अपने अखण्ड तनों को देखो। अपनी परआत्म को निरखो। अपनी सुभान श्री श्यामाजी का अनुपम स्वरूप देखो तथा अपने अखण्ड धनी से विलसने के लिए अपने अखण्ड सिनगार को धारण करो (अर्थात् संसार में सच्चे अंग के भाव से चलो)।
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