जब इस्क इनों आवसी, तब देखेंगे मुझको ।
इस्क बिना इन अर्स में, मैं मिलों नहीं इनसों ।।
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वाणी में श्री जी ने फुरमाया है कि बात बड़ी है मेहर की,हक के दिल का प्यार। सो जाने दिल हक का, या मेहेर जाने मेहेर को सुमार।। बात बड़ी है मेहेर की, मेहेर होए न बिना अंकुर | अंकुर सोई हक निसबत, माहें बसत तज्जला नूर || दुःखरूपी इन जिमी में, दुःख ना काहूं देखत। बात बडी़ है मेहेर की,जो दुःख में सुख लेवत।।
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श्री गुम्मट साहिब जी को अकसी बहिश्त कहा है
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यह रसना श्यामा जी की है और रब यानि श्री राजी के इश्क का रस पिलाती है और इसको पीने से अव्वल ब्रह्म सृष्टि को सुख मिलेगा और पीछे समस्त संसार को यह वाणी मुक्ति देगी
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हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम रसूल साहब ने श्री राजजी से पूछा कि हुकम रुपी वृक्ष के ऊपर मुर्गे श्री श्यामा जी की सूरता ने चोंच में खाक झूठा वजूद क्यों दबा रखी है झूठा तन श्री श्यामा जी ने क्यों धारण किया है तब श्री राजजी ने जवाब दिया कि उम्मत ने ये संसार रुपी झूठा खेल देखने की मांग कर के गुनाह कर लिया है तो उन सभी सूरताओं को खेल से वापस लाने के लिये ये श्री देवचन्द्र जी रुपी झूठा...
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पांचवे पोहोर में
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