तुम बैठे मेरे कदम तले, कहूं गईयां नाहीं दूर।
ऐ याद करो इन इस्क को, जो आपन करीं मजकूर।
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कुरान के एक किस्से में मलकी महंमद श्री श्यामा जी को आसमानी मुर्ग करके कहा है जिसने ईलम के सागर में नहाकर अपने पंख फड़फड़ाये जिससे बूंदे गिरीं और उन बूंदों से भाव उन मोमिनों से है जिन्होंने हकी मुहम्मद श्री प्राणनाथ जी की पहचान उन्हीं के ज्ञान द्वारा समस्त जगत में पैगाम पहुँचा उनको जाहिर किया
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रंगमहल की दक्षिण दिशा में बटपीपल की चौकी फिर हौजकौसर ताल को घेरकर कुंज निकुज की शोभा आगे चौबीस हांस का महल फिर जेवरों की नहरें आगे माणिक पहाड़ और उसकी हद में ही बड़ो बन मधु बन महावन फिर वन की नहरें और उसके आगे छोटी रांग बड़ी रांग की हवेलियों की शोभा के साथ जिमीं और सागरों की शोभा भी आई है और दक्षिण दिशा में नीर सागर की शोभा भी आई है
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भला भाई
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श्री इंद्रावती जी की आतम मोमिनो को बता रही हैं मैं और बिहारी जी दोनों ही सदगुरु धनी श्री देवचंद्र जी के बंदे थे हम दोनों का झगड़ा होने के कारण दोनों जमाते अलग अलग हो गई ब्रह्म सृष्टि तथा ईश्वरीय सृष्टि मेरे साथ हो गई,जीव सृष्टि जो बातूनी अर्थो को नहीं समझते थे उन्होंने प्राथमिकता बिहारी जी को दे दी यह सारी बातें कुरान में लिखी हुई हैं।
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शुक्ल पक्ष की चौदस को हम सब सखियाँ व श्री राजश्यामा जी के साथ टापू महल की चादनी पर बैठते हैं और चारों घाटों की शोभा का आनंद लेते हैं और ये हैं सोलह देहरी का घाट तेरह देहरी का घाट झुण्ड का घाट नौ देहरी का घाट
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