जब इस्क इनों आवसी, तब देखेंगे मुझको ।
इस्क बिना इन अर्स में, मैं मिलों नहीं इनसों ।।
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हे मेरे प्राणों से भी प्यारे श्यामा महारानी ! अब मुझे एक पल के लिए भी छोड़ना नहीं। अब मुझे प्यारे मेहबूब श्री राजजी महाराज की मेहर से आपके चरण कमल की पहचान हो गई है। यही मेरे जीव के जीवन हैं।
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श्री महामतिजी कहते हैं कि हे साथजी! तुम माया में सावधान हो जाओ। तुम्हारी निसबत होने के कारण ही धनी माया में आकर मिले हैं, अतः यदि इस झूठी दुनियां को छोड़कर रूह दुनी को पीठ देकर अखण्ड परमधाम के अखंड सुख याद करके अपने पिया को याद करती है तो वोह ऐसे सतगुरु को इस खेल में रिझा लेगी।
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श्री राजजी महाराज ने अपने आप को सच्चा साबित करने के लिए सब कुछ पहले से ही बता दिया था कि माया में जाकर तुम सब मुझे भूल जाओगी , यह वियोग का खेल बड़ा दुखदायी है। तुम इसे कैसे सहन कर पाओगी । इससे मोमिनों के दिल में चाहना और बढ़ गई और कहा कि हमारे ऊपर एहसान क्यों कर रहे हो
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श्री श्यामा महारानी के चरणों के चारों आभूषण झांझरी, घूंघरी, कांबी और कड़ला तथा चरणों के पंजे में अनवट और बिछुआ का तेज और सुन्दर सुरीली आवाज यह ही मेरे जीव के जीवन हैं।
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धनी के प्रेम का रास्ता बड़ा कठिन है। इसमें कई कर्मकाण्ड (शरीयत) उपासनाकाण्ड (तरीकत) और ज्ञानकाण्ड (हकीकत) के तीन टेढ़े रास्ते यानि की तीन बंकर हैं, जिन पर चलने वाले बड़े-बड़े शूरवीर भी इस प्रेम-मार्ग पर नहीं चल पाते। यह रास्ता तलवार की धार पर चलने के समान है। इस रास्ते में सामने से गुण, अंग, इन्द्रियों के भाले छेद रहे हैं, इसलिए हे मेरी आत्मा! तुम धैर्य और साहस का श्रृंगार करके चलो।
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