इनों रब्द किया इस्क का, हम जैसा हक का नाहें ।
दई फरामोसी इन वास्ते, देखों कैसा इस्क इनों माहें ।।
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उनके पास जाग्रत बुद्ध तो थी मगर निजबुद्ध न होने की वजह से उन्हें जागनी की सुध नहीं थी
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क्योंकि श्री देवचन्द्र जी श्री कृष्ण बांके बिहारी का ही चितवन करते रहे पर जब दर्शन हुए तो वोह असमंजस में पड़ गए कि जिसको मैं चितवन में देखता रहा यह वोह सरूप तो नहीं है न ही उस सरूप का यह सिनगार है । यह श्री बांके बिहारी तो लग नहीं रहे पर दिल यहीं गवाही दे रहा है कि यह मेरे खाविंद हैं इसलिए श्री राज जी ने उनसे कहा कि तुम किसकी अर्धांगनी हो यह दृढ करके मुझे कहो । जो तुम मुझे समझ रही हो मैं वोह बांके...
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श्री राज जी महाराज तीन बार सुबह फिर सैर पें जाने से पहले फिर वनों में श्री श्यामा जी और सखियां दो बार एक बार सुबह दूसरी बार वनों में
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युगल सरूप श्री राज स्यामा जी के दर्शन हुए थे राधे कृष्ण के नहीं और झूठ यह था कि इन्द्रावती जी श्री राज जी से कहती हैं कि आपने हमें अपने साथ क्यूं नहीं जोड़ा,अपनी असल पहचान हमसे छिपा कर क्यूं ब्रज रास से जोड़े रखा ।
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विजया अभिनंद बुद्ध जी मलकी सरूप धनी श्री देवचन्द्र जी को कहा है और नेहेकलंक श्री जी साहिब हकी सरूप को कहा है
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